सत्ता के हस्तांतरण के समय जिन्ना ने ख़्वाहिश प्रकट की थी कि उनकी कुर्सी लार्ड माउंटबेटन की कुर्सी के ऊपर रखी जाए, जिसे ब्रिटिश सरकार ने अस्वीकार कर दिया था.
देवेशर बताते हैं, 'अंग्रेज़ों ने उन्हें साफ़ कह दिया कि जिन्ना पाकिस्तान के गनर्नर जनरल तभी बनेंगे जब भारत के वायसराय माउंटबेटन उन्हें इस पद की शपथ दिलाएंगे. शपथ लेने से पहले जिन्ना का कोई आधिकारिक पद नहीं है. इसलिए उनकी कुर्सी का माउंटबेटन की कुर्सी से ऊपर रखा जाना न तो उचित है और न ही स्वीकार्य. जिन्ना ने बहुत झिझकते हुए अंग्रेज़ों के इस तर्क को स्वीकार किया था.'ये एक ऐतिहासिक सत्य है और जिन्ना का खुद का भी मानना था कि पाकिस्तान को उन्होंने ही बनाया है.
हुमायूं मिर्ज़ा अपनी किताब 'फ़्रॉम प्लासी टू पाकिस्तान' में लिखते हैं, 'एक बार पाकिस्तान के रक्षा सचिव रहे और बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे इसकंदर मिर्ज़ा ने जिन्ना से कहा था कि हमें मुस्लिम लीग का ध्यान रखना चाहिए जिन्होंने हमें पाकिस्तान दिया है.
जिन्ना ने तुरंत जवाब दिया था, 'कौन कहता है मुस्लिम लीग ने हमें पाकिस्तान दिया? मैंने पाकिस्तान को खड़ा किया है अपने स्टेनोग्राफ़र की मदद से.'कराची में जिन्ना का दिन आमतौर से सुबह साढ़े आठ बजे शुरू होता था. एक बड़ी मेज़ के सामने जिन्ना के सामने कागज़ातों का एक ढेर रख दिया जाता था.
पास ही में 'क्रेविन-ए' सिगरेटों का एक डिब्बा रखा रहता था. उनके पास बेहतरीन क्यूबन सिगार भी होते थे, जिनकी सुगंध से उनका कमरा हमेशा महकता रहता था.
जिन्ना अपने आप को मुसलमानों का राजनीतिक नेता मानते थे, न कि धार्मिक नेता. इसकी वजह से उन्हें कई बार धर्मसंकट से भी गुज़रना पड़ा था.
मशहूर लेखक ख़ालिद लतीफ़ गौबा ने एक जगह लिखा है कि एक बार उन्होंने जिन्ना को एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए आमंत्रित किया.
जिन्ना बोले, 'मुझे नहीं पता कि नमाज़ किस तरह पढ़ी जाती है.'
मैंने जवाब दिया, 'आप वही करिए जो दूसरे वहाँ कर रहे हैं.'
एक ज़माने में जिन्ना के असिस्टेंट रहे और बाद में भारत के विदेश मंत्री बने मोहम्मद करीम छागला अपनी आत्मकथा 'रोज़ेज़ इन दिसंबर' में लिखते हैं, 'एक बार मैंने और जिन्ना ने तय किया कि हमलोग बंबई के मशहूर रेस्तराँ 'कॉर्नेग्लियाज़' में जा कर खाना खाएंगे. जिन्ना ने दो कप कॉफ़ी, पेस्ट्री और सुअर के सॉसेज मंगाए. हम इस खाने का मज़ा ले ही रहे थे कि एक बूढ़ा दाढ़ी वाला मुसलमान एक दस साल के लड़के के साथ वहाँ पहुंच गया.'
'वो दोनों आ कर जिन्ना के नज़दीक बैठ गए. तभी मैंने देखा कि लड़के का हाथ धीरे धीरे पोर्क सॉसेज की तरफ़ बढ़ रहा है. उसने धीरे से एक टुकड़ा उठा कर अपने मुंह में रख लिया. मैं इसे बेचैनी के साथ देख रहा था.'
कुछ देर बाद जब वो चले गए तो जिन्ना गुस्से में मुझसे बोले, 'छागला तुम्हें ख़ुद पर शर्म आनी चाहिए. तुमने उस लड़के को पोर्ट सॉसेज क्यों खाने दिए?'
मैंने कहा जिन्ना साहब, मेरी उलझन ये थी कि मैं आपको चुनाव हरवा दूँ या फिर उस लड़के को ख़ुदा का कहर झेलने दूँ. आख़िर में मैंने आपके हक़ में फ़ैसला किया.'